गज़ल

तुम से कुछ ना होगा

ना, तुम से कुछ ना होगा, पहनो कोई भी चोगा ।
ना, तुम से कुछ ना होगा ।

राग तुम अपना ही गाओ, रो लो अपना रोना,
बस खुद को ही बडा दिखाओ, कहो औरो को बोना।
अपनी ही जो हांके जाए, बनेगा पंडित पोगा ।
ना, तुम से कुछ ना होगा, पहनो कोई भी चोगा ।

गलती सब की बतलाता है, दंड भी देता जाता,
ऐसा ही हुं में...बोल के किस को क्या समज़ाता?
किसने बनाया तुम को पुरी दुनिया का दरोगा?
ना, तुम से कुछ ना होगा, पहनो कोई भी चोगा ।

छोटे छोटे सुख छोड़ कर, कितना धन है झड़पा?
तेरे मन के कल्पित सुख में तन है कितना तड़पा ?
तन की ईन्द्रियों के वश में मन ने कितना भोगा ?
ना, तुम से कुछ ना होगा, पहनो कोई भी चोगा ।

ना, तुम से कुछ ना होगा, पहनो कोई भी चोगा ।
ना, तुम से कुछ ना होगा ।

(3.12.15)


कुछ ओर
मन हमारा जो भी कहे, मानसिकता कुछ ओर है ।
कहने का सच ओर, वास्तविकता कुछ ओर है ।

मिलना भी जब चाहा, एक बहाना तैयार था,
हम भी जानते थे, यह व्यस्तता कुछ ओर है ।

प्रतीक्षा है प्रति क्षण, एक क्षण तो मीलोगे,
तुम मुर्खता भले मानो, यह मुर्खता  कुछ ओर है ।

इस अकेलेपन को यादों से से भर दिया है,
वह सुनापन अलग था, यह रिक्तता कुछ ओर है ।


बीती बातें 
बीती बातें दोहराई जाए,
सूखी आंखे रुलाई जए ।

आती जाती है जो सांस सी,
यादें वो सारी भुलाई जाए ।

अब रोशनी की क्या जरुरत?
उमीद हर एक मिटाई जाए...

फिर कभी भी जल न पाए,
हर लौ...एसे बुझाई जाए।

उसके दिल पे बोझ न पड़े,
कुछ एसी चाल चलाई जाए...

मै ही बेवफा था आखिर,
यह बात उसको मनवाई जाए ।

कत्ल करने को काफी है,
पलकें गिराई जाए, उठाई जाए।

जहां आना जाना हो उनका,
लाश वहीं दफनाई जाए ।


शाम
यह दिन ढल रहा है,
पर शाम रुक गई है,
सब पंछी उड़ रहें है,
आवाम रुक गई है।

जो धुप में थी दौडी,
वह बादलों की टोली,
ईस सांझ के किनारे,
सरेआम रुक गई है।

यह रास्ते, चौराहे,
गलीयां तो थक चूकी है,
चहलपहल भी लेने...
आराम रुक गई है।

जरा पोंछ कर पसीना,
मैं आगे बढ रहा हुं,
मेरी जिंदगानी हो कर...
गुमनाम रुक गई है!


दुर रहे चाहे पास रहे!
तु दुर रहे चाहे पास रहे,
मिलने की झुठी आस रहे।

तेरे आने की ना तमन्ना हो,
तेरी राह में हम क्यूं उदास रहे?

तेरा नाम लबों पे आए नहीं,
मुझे ईतना होश-ओ-हवास रहे।

मेरे होने से बढ कर है की,
तेरे होने का एहसास रहे।

वो हंस दे कभी तो क्या होगा?
जिसे ग़म ही हंमेशा रास सहे।

खुशीयों के पल बीतें है मगर...
जितने भी रहे, वो खास रहे।

(7.4.15)


एहसान 
बस एक मुलाकात का एहसान हो जाए ।
मुझे भी कुछ होने का गुमान हो जाए ।

सदियों से शायद तुम्हे जानता हुं मैं,
तुम्हे भी मेरी कुछ पहेचान हो जाए ।

जो दुनिया आज मुजे अनदेखा करती है,
तुम्हे देख मेरे साथ, वो भी हैरान हो जाए !

तुम जिसे दो कदम चलना कहती हो,
हो सकता है वह मेरी उडान हो जाए ।

पाना तुम्हें कभी मुमकीन ही नही,
यह समज़ना ओर भी आसान हो जाए।

फिर चाहे बाद में हम अन्जान हो जाएं,
बस एक मुलाकात का एहसान हो जाए ।

(4.5.15)



गज़ल 
कागज़-कलम उठाए, तो गज़ल बन गई,
फिर कुछ लिख ना पाए, तो गज़ल बन गई!

हमने तुम को मांगा और तुम मुस्कुराए,
कुछ ख्वाब ऍसे आए, तो गज़ल बन गई!

मुलाकातों में अक्सर खामोश ही रहे हम,
तनहा दो पल बिताए, तो गज़ल बन गई!

चिंगारी जैसी यादें सीने में उठ रही थी,
जब शोले लपलपाए, तो गज़ल बन गई!

भेजने से जिनको कोई फर्क भी न पड़ता,
ख़त सारे वो जलाए, तो गज़ल बन गई!

दर्द-ओ-ग़म, ग़म-ए-शाम और शाम-ए-तनहाई,
सीने से जब लगाए, तो गज़ल बन गई!

(9.6.15)

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