ईश्वर

शब्दों से शुरुआत करते है । हर एक शब्द मनुष्य ने ही बनाया है । शब्द, व्याकरण, बोली, लेखन आदि हर एक चीज़ हमने ही बनाई है । अगर ध्यान से सोचें तो मेरी बात सामने वाले को वैसे ही रुप में समझ में आना भी कितनी बड़ी बात है!

खेर, अब यह विवादास्पद मुद्दे की बात करते है । इस मुद्दे पर युग युग से खून बहते आया है । और हर एक इन्सान इस मुद्दे पर अत्यधिक ईमोशनल एवं झनूनी बन जाता है। इस कारण वह कभी इस से आगे सोचना  भी नही चाहता । और सोचे भी क्यों? यह सोचना ही कितना सुखकारक है की एक बहुत बड़ी शक्ति हमारी रक्षा कर रही है। हर एक मुसीबत, हर एक आशंका, हर एक डर उस बड़ी शक्ति के विचार मात्र से दूर हो जाता है ।

किंतु....मन चाहे सुख-संतोष की प्राप्ति के पश्च्यात् हम आगे की ओर सोचने लगते है । पहले तो मनुष्य एक दूसरे की मदद करता था...लेकिन भौतिक सुख मिल जाने के बाद अपनेआप यह अपेक्षा और कुदरती मदद की सोच ग़ायब हो जाती है । हम बदलते है । हम और बदलेंगे ।

ईश्वर ही क्यों?
इन्सान ज्ञानी है, सो डरपोक है। वह परिणाम का अंदाज़ा लगा लेता है। लेकिन उसे जीने के लिये लड़ाई तो लडनी है, प्रयत्न तो करने ही है। फिर ऐसा कोन सा मानसिक आश्वासन था जो इस भीती को दूर कर सकता था? हां, ईश्वर का विचार! एक अद्‍भूत शक्ति के साथ होने का आश्वासन। सो "ईश्वर" का कोन्सेप्ट उस इन्सान द्वारा सोचा गया होगा, जो कबीले में सबसे पूज्य होगा और बहुत विद्वान। कुदरति आपत्ति, आपदा, मुसीबत, असाध्य रोग इत्यादि से बचने के लिये भी इसी सोच का सहारा लिया गया।

ईश्वर कहां है?
ज्ञानी, महात्मा या मनुष्य, किसी ने...किसी ने भी ईश्वर को देखा नही है। केवल अनुभूति होने का दावा करते है। यह वही अनुभूति है जो किसी चीज़ की तीव्र इच्छा, महत्वाकांक्षा, दिवास्वपनो के अतिरेक से हम भी महसूस कर चुके है। लेकिन अगर किसी से पूछो, तो उत्तर मिलेगा पामर, तुच्छ इन्सान कभी ईश्वर को देख नही सकता।


जीवन किसने बनाया?
अब यह प्रश्न सबसे बड़ा है। लाखों करोड़ो तारों से बनी है आकाशगंगा। ऐसी कितनी आकाशगंगाएँ होंगी? सब में ऐसे कितने तारे और ग्रह होंगे? यह गिनती करना असंभव है। कहीं पानी है तो हवा नही है, कहीं हवा है तो वातावरण योग्य नही है। तो ऐसे मे इस एक मात्र ग्रह पर जीने के लायक पर्याप्त सोर्स होना कोन सी बड़ी बात है? अगर किसी ग्रह पर पृथ्वी जैसी समानता होगी वहां भी जीवन अवश्य होगा।

इतिहास क्या कहता है?
किसी भी देश के लिखित ईतिहासमें कहीं ईश्वर की उपस्थिति दिखाई नहीं दी है। बुरा करने वाला प्रायः बहुचर्चित रहा है। अच्छे मगर विरोध करनेवालों को कुचल दिया गया। धर्म के नाम पर लहु बहा है और सब के कर्ता धर्ता राजकारणी रहें है। किंतु...परंतु....किसी को भी...किसी को भी सज़ा नहीं मिली। धर्मोपदेश में बुरे आचरण करने वालो को बुरा नतीज़ा मिलने की बात लिखी गई है लेकिन आज तक....देखी नही गई है! हां, अच्छा बुरा वक्त सबके जीवन में आता है, तो धर्मगुरूओ द्वारा उस बुरे वक्त को बुरे लोगो की सज़ा बताई गई। तो इतिहास में ईश्वर की उपस्थिति अभी तक किसी के सामने नहीं आई है।

अब क्या होगा?
अगर लोजिकल सोचा जाये तो, आज जो मैं पढ़ाई कर रहा हुं उसकी कल मुझे नौकरी मिलेगी। आज जो प्लान्ट डाले गए है, वह सारे कल काम करने लगेंगे। हम जो भविष्य सोच रहें है, जो काम कर रहें है उसी दिशा में आगे बढेंगे। भारत विश्व शक्ति की और बढ़ना चाहता है, मगर शायद जनसंख्या बढ़ने की वज़ह से नहीं बन सकता। पढ़े-लिखे लोग वॅस्टर्न हो रहें है। उनके काम, अंदाज़, सोच उसी दिशा में बढ़ रही है। सो जो कल्चर वहां है वो यहां आ जायेगा। लेकिन प्रादेशिक समानता की वज़ह से कहीं ज़्यादा तो कहीं कम असर रहेगा। और जनसंख्या भी ज्यादा होने से काफी सारे वेरियेशन होंगे।

नयी सोच क्यों?
मान लो अगर ईश्वर है ही नही, तो फिर सब कितना साफ-साफ दिखने लगता है। जिसकी लाठी, उसकी भेंस। अगर सारी ईश्वरी अपेक्षाएँ ख़त्म, तो मानसिक दुःख कुछ हद तक ख़त्म! खुद पर विश्वास भी बढ़ सकता है। अगर सोचना ही है तो दोनो तरफ सोचना होगा। जैसे आस्तिक मन में उठे सारे सवाल मंथन कर के खुद ढूंढ निकालता है, वैसे ही अब जो मन में ख़याल उठेंगे उनके जवाब मेरे फेवर में भी आपको ही ढूंढने होंगे।

ईश्वर नही है यह सोचना भी गलत नही है। क्यूँ की हम सब परम सत्य जानना चाहते है।

( यह लेख किसी एक धर्म के लिये, एक देश के लिये नहिं लिखा गया है। यह सिर्फ एक सोच है, जो ग़लत भी हो सकती है। हो सकता है की ईश्वर हो, और मुझे नर्क में डाल दे! : D )